मंडी में वन अधिकार अधिनियम पर प्रशिक्षण, दावों में तेजी

rakesh nandan

24/04/2026

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला में वन अधिकार अधिनियम 2006 के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर प्रशासन ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इस दिशा में डीआरडीए सभागार में एसडीएम, बीडीओ तथा वन विभाग के अधिकारियों के लिए एक दिवसीय क्षमता संवर्धन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे अधिकारियों को अधिनियम की प्रक्रियाओं, नियमों और दावों के निपटान की प्रणाली से भली-भांति अवगत कराना था।

कार्यक्रम की अध्यक्षता उपायुक्त मंडी अपूर्व देवगन ने की। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि मंडी जिला में गद्दी, गुज्जर तथा अन्य वन-निर्भर समुदायों की उपस्थिति को देखते हुए अधिकारियों का इस कानून की बारीकियों को समझना बेहद जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि अधिकारी अधिनियम की प्रक्रिया को सही ढंग से समझेंगे, तो दावों के निपटान में तेजी आएगी और पात्र लोगों को समय पर उनके अधिकार मिल सकेंगे।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान वन अधिकार अधिनियम के तहत दावों की वर्तमान स्थिति, प्रक्रियाओं में सुधार और जमीनी स्तर पर सामने आ रही समस्याओं पर विस्तार से चर्चा की गई। अधिकारियों को यह भी बताया गया कि दावे प्रस्तुत करने के लिए किन-किन दस्तावेजों और साक्ष्यों की आवश्यकता होती है तथा ग्राम सभा की इस प्रक्रिया में क्या भूमिका होती है। ग्राम सभा को अधिनियम के तहत एक महत्वपूर्ण इकाई माना गया है, जो दावों की जांच और अनुशंसा में प्रमुख भूमिका निभाती है।

उपायुक्त अपूर्व देवगन ने जानकारी दी कि राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार जिला मंडी में इस अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि जिले के सभी 12 उपमंडलों में प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं, जिनमें ग्राम सभाओं, पंचायती राज संस्थाओं और वन अधिकार समितियों को शामिल किया गया है।

उन्होंने बताया कि अब तक 2722 वन अधिकार समितियों को संवेदनशील और पुनः सक्रिय किया जा चुका है। इनमें से कई समितियां पहले निष्क्रिय थीं, जिन्हें मोहल सभाओं के माध्यम से पुनर्जीवित किया गया है। इसके अलावा, 220 निष्क्रिय समितियों को विशेष प्रयासों के तहत सक्रिय किया गया है, जिससे दावों की प्रक्रिया को गति मिली है। अब इन समितियों के माध्यम से दावों के आमंत्रण, जांच और निपटान का कार्य तेजी से किया जा रहा है।

बैठक में नगर निगम मंडी के आयुक्त रोहित राठौर तथा अतिरिक्त सचिव राजस्व अनिल चौहान ने ऑनलाइन माध्यम से अधिकारियों को अधिनियम की बारीकियों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया that यह अधिनियम वनभूमि पर निर्भर समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने और उनके अधिकारों को कानूनी मान्यता देने के उद्देश्य से लागू किया गया है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिनियम के तहत पात्र समुदायों में वन क्षेत्रों में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियां तथा अन्य परम्परागत वन निवासी शामिल हैं। अन्य परम्परागत वन निवासियों के लिए यह आवश्यक है कि वे 13 दिसंबर 2005 से पहले कम से कम तीन पीढ़ियों (लगभग 75 वर्ष) से वनभूमि पर निर्भरता का प्रमाण प्रस्तुत करें। यह प्रमाण किसी विशेष भूमि के स्वामित्व से संबंधित नहीं होता, बल्कि उस क्षेत्र की वनभूमि पर निर्भरता को दर्शाता है।

प्रशिक्षण कार्यक्रम में अतिरिक्त उपायुक्त गुरसिमर सिंह, अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी डॉ मदन कुमार सहित जिले के सभी उपमंडलाधिकारी, खंड विकास अधिकारी और वन विभाग के अधिकारी उपस्थित रहे। सभी अधिकारियों ने प्रशिक्षण को उपयोगी बताते हुए इसे जमीनी स्तर पर लागू करने का संकल्प लिया।

अंततः, यह कहा जा सकता है कि मंडी में आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम वन अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल अधिकारियों की समझ में वृद्धि होगी, बल्कि वन-निर्भर समुदायों को उनके अधिकार दिलाने में भी मदद मिलेगी।