बिलासपुर में 30 बीघा भूमि पर टमाटर की व्यावसायिक खेती

rakesh nandan

02/06/2026

हिमाचल प्रदेश में कृषि क्षेत्र को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से फसल विविधीकरण को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी दिशा में हिमाचल प्रदेश फसल विविधीकरण प्रोत्साहन परियोजना (एचपीसीडीपी-चरण-2) के अंतर्गत जिला बिलासपुर के ग्राम छकोह में टमाटर की व्यावसायिक खेती को सफलतापूर्वक प्रोत्साहित किया जा रहा है। जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जाइका) के सहयोग से संचालित इस परियोजना के तहत किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों और विशेषज्ञ मार्गदर्शन का लाभ मिल रहा है।

हाल ही में खंड परियोजना प्रबंधन इकाई, बिलासपुर के अधिकारियों ने ग्राम छकोह का दौरा कर टमाटर उत्पादक किसानों के खेतों का निरीक्षण किया। इस दौरान फसल की वर्तमान स्थिति, पौधों की वृद्धि, उत्पादन क्षमता और खेतों में अपनाई जा रही कृषि तकनीकों का विस्तृत मूल्यांकन किया गया।

परियोजना के तहत वर्तमान में लगभग 30 किसान 30 बीघा भूमि पर टमाटर की व्यावसायिक खेती कर रहे हैं। यह पहल क्षेत्र में पारंपरिक खेती के साथ-साथ नगदी फसलों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। किसानों को उम्मीद है कि टमाटर उत्पादन से उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और खेती अधिक लाभदायक बनेगी।

निरीक्षण के दौरान खंड परियोजना प्रबंधक पवन कुमार और कृषि प्रसार अधिकारी मोहित नायक ने किसानों से सीधा संवाद किया। उन्होंने खेतों में जाकर टमाटर की फसल का निरीक्षण किया तथा किसानों द्वारा अपनाई जा रही कृषि पद्धतियों की समीक्षा की। अधिकारियों ने फसल की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए विभिन्न सुझाव भी दिए।

इस अवसर पर किसान राम रतन, चमेल सिंह और अन्य टमाटर उत्पादक किसान भी मौजूद रहे। किसानों ने अधिकारियों के साथ अपने अनुभव साझा किए तथा खेती के दौरान आने वाली चुनौतियों के बारे में चर्चा की। अधिकारियों ने किसानों की समस्याओं को ध्यानपूर्वक सुना और उनके समाधान के लिए आवश्यक तकनीकी परामर्श प्रदान किया।

खंड परियोजना प्रबंधक पवन कुमार ने किसानों को टमाटर फसल में लगने वाले विभिन्न कीटों और रोगों की पहचान तथा उनके नियंत्रण के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यदि किसान नियमित रूप से फसल की निगरानी करें और समय रहते आवश्यक उपाय अपनाएं तो फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है। इससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा।

उन्होंने किसानों को एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) तकनीक अपनाने की सलाह दी। आईपीएम के माध्यम से रासायनिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग को कम करते हुए पर्यावरण के अनुकूल तरीके से कीट नियंत्रण किया जा सकता है। इसके अलावा उन्होंने संतुलित उर्वरक उपयोग और मृदा स्वास्थ्य संरक्षण पर भी विशेष जोर दिया।

अधिकारियों ने बताया कि टमाटर जैसी नगदी फसलों में निराई-गुड़ाई, समय पर सिंचाई और पौधों को सहारा देने के लिए स्टेकिंग जैसी वैज्ञानिक तकनीकों का विशेष महत्व होता है। इन उपायों को अपनाने से पौधों का विकास बेहतर होता है और फल की गुणवत्ता में भी सुधार आता है। अच्छी गुणवत्ता वाली फसल को बाजार में बेहतर मूल्य मिलने की संभावना रहती है, जिससे किसानों की आय बढ़ती है।

जाइका समर्थित इस परियोजना का उद्देश्य किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ-साथ उच्च मूल्य वाली सब्जियों और नगदी फसलों की खेती के लिए प्रेरित करना है। परियोजना के माध्यम से किसानों को तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और कृषि विशेषज्ञों का मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे किसान आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।

अधिकारियों ने किसानों से परियोजना के अंतर्गत उपलब्ध सुविधाओं का अधिकतम लाभ उठाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक खेती अपनाकर किसान उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ अपनी आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों का उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

किसानों ने भी परियोजना के माध्यम से मिल रहे सहयोग और मार्गदर्शन के लिए आभार व्यक्त किया। उनका कहना है कि विशेषज्ञों की सलाह और तकनीकी सहायता से उन्हें फसल प्रबंधन में काफी मदद मिल रही है तथा वे बेहतर उत्पादन प्राप्त करने में सफल हो रहे हैं।

फसल विविधीकरण प्रोत्साहन परियोजना के तहत किए जा रहे प्रयास न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक साबित हो रहे हैं, बल्कि क्षेत्र में सब्जी उत्पादन को भी नई दिशा दे रहे हैं। यह पहल कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।