महिला आरक्षण पर बिंदल का कांग्रेस पर हमला

rakesh nandan

18/04/2026

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में महिला आरक्षण को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ राजीव बिंदल ने कांग्रेस पार्टी और उसके सहयोगी दलों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक के पारित न होने पर कांग्रेस की भूमिका की कड़ी आलोचना की है।

डॉ. बिंदल ने कहा कि यह केवल एक विधेयक का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह देश की महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण से जुड़ा विषय है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की मानसिकता महिलाओं के हित में नहीं है और उनके निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है।

उन्होंने कहा कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव लंबे समय से चर्चा में रहा है और यह देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। ऐसे में इस विधेयक का पारित न होना दुर्भाग्यपूर्ण है।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने न केवल इस विधेयक का समर्थन नहीं किया, बल्कि इसके विफल होने पर जश्न मनाया और इसे अपनी जीत के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने इसे नारी शक्ति का अपमान बताते हुए कहा कि यह महिलाओं के अधिकारों के प्रति कांग्रेस की वास्तविक सोच को उजागर करता है।

डॉ. बिंदल ने कहा कि भाजपा हमेशा से महिलाओं के सशक्तिकरण के पक्ष में रही है और केंद्र सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई गई हैं, जिनका उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक भी इसी दिशा में एक बड़ा कदम था।

उन्होंने यह भी कहा कि देश की महिलाएं अब जागरूक हो चुकी हैं और वे समझती हैं कि कौन-सी राजनीतिक ताकतें उनके अधिकारों के लिए काम कर रही हैं और कौन उनके हितों की अनदेखी कर रही हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में महिलाएं अपने मताधिकार का उपयोग कर सही निर्णय लेंगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण का मुद्दा देश की राजनीति में हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है और इस पर विभिन्न दलों के अलग-अलग विचार रहे हैं। ऐसे में इस विषय पर जारी बयानबाजी आने वाले समय में और तेज हो सकती है।

डॉ. बिंदल ने अंत में कहा कि महिला सशक्तिकरण केवल नारों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह इस दिशा में गंभीर नहीं है और केवल राजनीतिक लाभ के लिए इस मुद्दे का उपयोग करती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि महिला आरक्षण का मुद्दा केवल नीति का नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस विषय पर राजनीतिक दल किस प्रकार की रणनीति अपनाते हैं और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कौन-से ठोस कदम उठाए जाते हैं।