जिला हमीरपुर में कम वर्षा और पथरीली जमीन वाले क्षेत्रों में भी गन्ने की खेती संभव है—यह बात अब सिर्फ एक कल्पना नहीं, बल्कि एक सच्चाई बन चुकी है। विकास खंड बमसन के गांव हरनेड़ के प्रगतिशील किसान ललित कालिया ने इस असंभव लगने वाले कार्य को संभव कर दिखाया है।
🌱 प्राकृतिक खेती से गन्ने की सफलता
पूरी तरह प्राकृतिक खेती अपनाने वाले ललित कालिया ने मात्र 18 मरले भूमि पर गन्ने की खेती करके पहले ही सीजन में लगभग 70 किलोग्राम शक्कर तैयार की है। यह उपलब्धि इसलिए और भी खास है क्योंकि जिस क्षेत्र में पानी की कमी और पथरीली जमीन हो, वहां गन्ने जैसी फसल उगाना बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
👨🌾 गांव के अन्य किसान भी प्रेरित
ललित कालिया के साथ गांव चमनेड के किसान पवन कुमार और आतमा परियोजना के अधिकारियों ने उपायुक्त गंधर्वा राठौड़ से मुलाकात कर प्राकृतिक खेती के सकारात्मक परिणामों की जानकारी दी। इस पहल से क्षेत्र के अन्य किसान भी प्रेरित हो रहे हैं और धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं।
🌾 52 परिवार जुड़े प्राकृतिक खेती से
ललित कालिया ने बताया कि उन्होंने कुछ वर्ष पहले प्राकृतिक खेती शुरू की थी। आतमा परियोजना और सरकार के प्रोत्साहन से अब गांव हरनेड़ के लगभग 52 परिवार इस पद्धति से जुड़ चुके हैं। ये किसान गेहूं, मक्की, मोटे अनाज और दलहनी फसलें भी प्राकृतिक तरीके से उगा रहे हैं, जिससे उनकी लागत कम और आय अधिक हो रही है।
🌿 बिना सिंचाई के तैयार हुई फसल
इस सफलता की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ललित कालिया ने गन्ने की फसल में एक बार भी सिंचाई नहीं की। हालांकि जंगली सूअरों ने फसल का कुछ हिस्सा नुकसान पहुंचाया, फिर भी उत्पादन संतोषजनक रहा। यह दर्शाता है कि प्राकृतिक खेती में मिट्टी की उर्वरता और नमी बनाए रखने की क्षमता अधिक होती है।
🔁 बार-बार बीज बोने की जरूरत नहीं
गन्ने की खेती का एक बड़ा फायदा यह भी है कि इसकी फसल 5 से 7 वर्षों तक उसी खेत में बनी रहती है। इससे किसानों को बार-बार बीज खरीदने और बोने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे लागत और मेहनत दोनों कम होती हैं।
🌾 पारंपरिक बीजों का संरक्षण
ललित कालिया पारंपरिक बीजों के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दे रहे हैं। उनका मानना है कि पुराने बीज अधिक पौष्टिक होते हैं और बदलते मौसम के अनुसार खुद को बेहतर ढंग से ढाल लेते हैं।
⚙️ घराट से भी बढ़ रही आय
गांव चमनेड के किसान पवन कुमार प्राकृतिक खेती के साथ-साथ अपना पारंपरिक घराट भी चला रहे हैं। वे रोजाना लगभग एक क्विंटल आटा पीसते हैं, जिसकी बाजार में अच्छी मांग है। घराट का आटा स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय का स्रोत मिल रहा है।
📈 किसानों के लिए नई दिशा
यह सफलता कहानी उन किसानों के लिए एक प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में खेती करते हैं। प्राकृतिक खेती न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि इससे किसानों की लागत कम और आय में वृद्धि भी संभव है।