अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने शुक्रवार को हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल को ज्ञापन सौंपते हुए डॉ. यशवंत सिंह परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के कुलपति पद का अतिरिक्त कार्यभार डॉ. एच.एस. बवेजा को दिए जाने पर गंभीर आपत्ति जताई है।
विद्यार्थी परिषद ने कहा कि जिन अधिकारी के विरुद्ध केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में जांच और आरोप पत्र दायर किए जा चुके हों, ऐसे व्यक्ति को विश्वविद्यालय के सर्वोच्च प्रशासनिक पद का दायित्व देना प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था की साख पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
ज्ञापन में एबीवीपी ने उल्लेख किया कि डॉ. एच.एस. बवेजा के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा देहरादून द्वारा कई मामलों में जांच की गई है। इन मामलों में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत कार्रवाई की गई है।
विद्यार्थी परिषद के अनुसार एक मामले में विशेष न्यायालय देहरादून में आरोप पत्र दायर किया जा चुका है और मामला वर्तमान में विचाराधीन है। दूसरे मामले में भी सीबीआई द्वारा आरोप पत्र दाखिल कर अभियोजन चलाया जा रहा है, जबकि तीसरे मामले में जांच रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की जा चुकी है।
एबीवीपी ने कहा कि यह केवल प्रारंभिक आरोप नहीं बल्कि केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा विस्तृत जांच के बाद न्यायालय में प्रस्तुत आधिकारिक मामले हैं। परिषद ने यह भी आरोप लगाया कि डॉ. बवेजा का नाम “Officer of Doubtful Integrity (ODI)” सूची के लिए भी अनुशंसित किया गया है।
परिषद ने कहा कि प्रशासनिक व्यवस्था में ODI श्रेणी अत्यंत गंभीर मानी जाती है, क्योंकि इसमें उन अधिकारियों को शामिल किया जाता है जिनकी सत्यनिष्ठा और कार्यप्रणाली पर गंभीर संदेह हो।
विद्यार्थी परिषद ने आरोप लगाया कि एक ओर सरकार और विभागीय अभिलेखों में संबंधित अधिकारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से जुड़े मामले दर्ज हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें विश्वविद्यालय के कुलपति पद का अतिरिक्त कार्यभार सौंपना नैतिक और प्रशासनिक मानकों के विपरीत है।
एबीवीपी ने कहा कि कुलपति का पद केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि शैक्षणिक और नैतिक नेतृत्व का प्रतीक होता है। ऐसे पद पर विवादित और आरोपित अधिकारी की नियुक्ति विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों के बीच अविश्वास की भावना पैदा कर सकती है।
विद्यार्थी परिषद ने पालमपुर में राज्यपाल से मांग करते हुए कहा कि 08 मई 2026 को जारी आदेश पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए और विश्वविद्यालय की गरिमा तथा विश्वसनीयता को ध्यान में रखते हुए किसी स्वच्छ और निष्पक्ष छवि वाले अधिकारी को यह दायित्व सौंपा जाए।
परिषद ने कहा कि विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की साख बनाए रखना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। इस प्रकार के निर्णय सार्वजनिक विश्वास को कमजोर कर सकते हैं।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने स्पष्ट किया कि यह विरोध किसी व्यक्तिगत भावना से प्रेरित नहीं है, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक मूल्यों की रक्षा के उद्देश्य से उठाया गया कदम है।