मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने शुक्रवार देर सायं हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला के हिमालयन सेंटर फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड रेजिलिएंस द्वारा संचालित आपदा जोखिम न्यूनीकरण और अनुसंधान गतिविधियों की समीक्षा के लिए उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की।
बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने राज्य में लगातार बढ़ रही बादल फटने की घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए सेंटर को इन घटनाओं का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश में बार-बार हो रही बादल फटने की घटनाओं के कारण मानव जीवन और संपत्ति को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है, इसलिए इनके स्वरूप और कारणों का वैज्ञानिक विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है।
मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि अध्ययन में बांधों के प्रभाव, तापमान में बदलाव, भौगोलिक परिस्थितियों तथा हिमालयी क्षेत्र में बादल फटने की घटनाओं के एरियल-डिस्टेंस आधारित विश्लेषण को शामिल किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि आपदा अध्ययन, खतरा आकलन और तकनीकी मूल्यांकन से संबंधित सभी राज्य स्तरीय अनुसंधान एवं विकास गतिविधियां इसी सेंटर के माध्यम से संचालित की जाएंगी।
मुख्यमंत्री ने हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एचपीएसडीएमए) को सेंटर की क्षमता निर्माण और सुदृढ़ीकरण के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों हेतु 6 करोड़ रुपये आवंटित करने के निर्देश दिए। इसके अतिरिक्त संस्थागत सुदृढ़ीकरण और क्षमता विस्तार के लिए 10 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि को भी मंजूरी प्रदान की गई।
उन्होंने ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) से संबंधित वैज्ञानिक अध्ययनों के लिए भी वित्तीय सहायता देने के निर्देश दिए और इसके लिए 1 करोड़ रुपये स्वीकृत किए। मुख्यमंत्री ने सेंटर को और अधिक मजबूत बनाने के लिए अतिरिक्त पेशेवरों और विषय विशेषज्ञों की भर्ती के निर्देश भी जारी किए, ताकि तकनीकी और अनुसंधान क्षमता को और मजबूत किया जा सके।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण और राज्य की त्वरित आपदा प्रतिक्रिया प्रणाली को प्रभावी बनाने में एचपीयू सेंटर के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के वैज्ञानिक अनुसंधान को हिमाचल प्रदेश के अन्य संवेदनशील क्षेत्रों तक भी विस्तारित किया जाना चाहिए, ताकि आपदा तैयारी और जोखिम न्यूनीकरण योजनाओं को और सशक्त बनाया जा सके।
उन्होंने कहा कि यह सेंटर राज्य सरकार को आपदा के बाद आवश्यकताओं के आकलन यानी पोस्ट डिजास्टर नीड्स असेसमेंट अध्ययन में भी सहयोग प्रदान करेगा।
बैठक में राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि भूस्खलन और ग्लेशियर से उत्पन्न बाढ़ जैसी घटनाओं से संबंधित अध्ययनों के लिए बाहरी एजेंसियों पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि राज्य में आपदा जोखिम न्यूनीकरण के क्षेत्र में तकनीकी और वैज्ञानिक क्षमता को मजबूत किया जाना चाहिए।
उन्होंने डीपीआर तैयार करने, तकनीकी विशेषज्ञता विकसित करने और राज्य में वैज्ञानिक क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए सेंटर द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।
बैठक के दौरान मंडी जिले के थुनाग क्षेत्र के लिए सेंटर द्वारा विकसित हाइड्रोडायनामिक मॉडल पर प्रस्तुति भी दी गई। इसमें फ्लैश फ्लड के प्रभावों का वैज्ञानिक आकलन, आपदा जोखिम आधारित योजना और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र विकसित करने पर विस्तार से जानकारी साझा की गई।
इसके अलावा आपदा अनुसंधान, खतरा आकलन, जलवायु जोखिम अध्ययन और राज्य सरकार को तकनीकी सहयोग प्रदान करने में सेंटर की भूमिका को भी रेखांकित किया गया।
बैठक में रघुबीर सिंह बाली, प्रो. महावीर सिंह, प्रो. एन. एस. नेगी, डॉ. महेश शर्मा सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।