हमीरपुर के निकटवर्ती गांव हरनेड़ के किसान Lalit Kalia प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में लगातार सराहनीय कार्य कर रहे हैं। उन्होंने इस सीजन में भी प्राकृतिक खेती के माध्यम से चने की अच्छी पैदावार हासिल कर अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का उदाहरण प्रस्तुत किया है। बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के खेती करके उन्होंने यह साबित किया है कि पारंपरिक और प्राकृतिक तरीके अपनाकर भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
ललित कालिया ने बताया कि इस बार उन्होंने अपने खेतों में गेहूं के साथ-साथ चने की भी बुआई की थी। उन्होंने कहा कि वे अपने खेतों में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग नहीं करते। प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों को अपनाते हुए उन्होंने पूरी फसल तैयार की।
उन्होंने जानकारी दी कि इस बार उन्हें गेहूं के साथ लगभग 75 किलोग्राम चने की पैदावार प्राप्त हुई है। खास बात यह रही कि चने की गुणवत्ता काफी अच्छी रही और फसल पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से तैयार की गई। स्थानीय स्तर पर भी उनकी इस खेती की काफी सराहना की जा रही है।
ललित कालिया इससे पहले भी प्राकृतिक खेती के जरिए चर्चा में रह चुके हैं। उन्होंने केवल 18 मरले भूमि पर गन्ने की खेती कर पहले ही सीजन में लगभग 70 किलोग्राम शक्कर तैयार की थी। उनकी इस उपलब्धि को प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में बड़ी सफलता माना गया था।
वे केवल खेती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पारंपरिक और देसी बीजों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। उन्होंने अपने घर में एक छोटा लेकिन समृद्ध बीज बैंक तैयार किया है, जिसमें कई दुर्लभ और पारंपरिक फसलों के देसी बीज संरक्षित किए गए हैं।
ललित कालिया के बीज बैंक में गेहूं की आठ अलग-अलग देसी किस्मों के बीज उपलब्ध हैं। इसके अलावा मक्की और जौ की भी पारंपरिक किस्मों को उन्होंने संरक्षित कर रखा है। उनका कहना है कि ये देसी किस्में पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं और कम बारिश की स्थिति में भी अच्छी पैदावार देती हैं।
उन्होंने कई पारंपरिक और धीरे-धीरे लुप्त हो रही मोटे अनाज की फसलों के बीज भी संरक्षित किए हैं। इनमें मंढल, कोदरा, कौंगणी और बाजरा जैसी फसलें शामिल हैं। ये मोटे अनाज स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद लाभकारी माने जाते हैं और जलवायु परिवर्तन के दौर में टिकाऊ खेती के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
इसके अलावा उनके बीज बैंक में सरसों और तिल की कई पुरानी किस्मों के बीज भी उपलब्ध हैं। दलहनी फसलों में कुल्थ, रौंग, माह और चने के देसी बीज भी उन्होंने सुरक्षित रखे हैं।
ललित कालिया ने सब्जियों के कई पुराने और दुर्लभ बीजों को भी संरक्षित किया है। उनके पास लहसुन, प्याज, भिंडी, घीया, कद्दू, रामतोरी, धनिया और मैथी सहित कई फसलों के पारंपरिक बीज मौजूद हैं। उनका कहना है कि आधुनिक हाइब्रिड बीजों के दौर में पारंपरिक बीजों को बचाना बेहद जरूरी है।
वे मानते हैं कि देसी बीज न केवल बेहतर स्वाद और पौष्टिकता प्रदान करते हैं, बल्कि ये स्थानीय जलवायु के अनुकूल भी होते हैं। यही कारण है कि प्राकृतिक खेती और देसी बीजों का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है।
स्थानीय किसान भी अब ललित कालिया की खेती पद्धति में रुचि दिखा रहे हैं। कई किसान उनके खेतों का दौरा कर प्राकृतिक खेती और बीज संरक्षण की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। उनकी सफलता से प्रेरित होकर क्षेत्र में कई किसान रासायनिक खेती छोड़ प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक खेती न केवल किसानों की लागत कम करती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में ललित कालिया जैसे किसान ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ खेती का मजबूत उदाहरण बनकर सामने आ रहे हैं।