रेशम कीट पालन से आत्मनिर्भर बन रहीं सरकाघाट की महिलाएं

rakesh nandan

07/06/2026

रेशम कीट पालन से आत्मनिर्भर बन रहीं सरकाघाट की महिलाएं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रहा नया आधार

मंडी। मुख्यमंत्री Sukhvinder Singh Sukhu के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित कर रही है। इन्हीं प्रयासों के तहत उद्योग विभाग के रेशम विंग द्वारा संचालित रेशम कीट पालन कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर महिलाओं के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनकर उभरा है। मंडी जिले के सरकाघाट क्षेत्र में अनेक महिलाएं इस योजना से जुड़कर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

मधु बनीं क्षेत्र की प्रेरणा

सरकाघाट तहसील के सिंहारन गांव की निवासी मधु इस योजना की सफलता का प्रेरणादायक उदाहरण हैं। उन्होंने बताया कि गांव में आयोजित रेशम विभाग के जागरूकता शिविर के माध्यम से उन्हें रेशम कीट पालन की जानकारी मिली। विभागीय मार्गदर्शन और सरकारी सहायता से प्रेरित होकर उन्होंने इस व्यवसाय को अपनाया।

मधु वर्तमान में अपने घर पर ही रेशम उत्पादन कर रही हैं। उनके अनुसार उत्पादित रेशम का बाजार मूल्य लगभग 1,000 से 1,200 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल जाता है। एक सीजन में उन्हें लगभग 12 हजार रुपये की आय होती है, जबकि वर्ष में दो सीजन के माध्यम से उनकी वार्षिक आय 24 से 25 हजार रुपये तक पहुंच जाती है।

सरकार से मिली पूरी सहायता

मधु ने बताया कि सरकार द्वारा उन्हें रेशम कीट पालन के लिए आवश्यक उपकरण जैसे रेयरिंग स्टैंड, प्लास्टिक ट्रे, नेट और अन्य सामग्री उपलब्ध करवाई गई है। इसके अतिरिक्त उत्पादन कार्य के लिए रेशम कक्ष भी प्रदान किया गया है। सरकार की ओर से शहतूत के पौधे, उनकी रोपाई के लिए आर्थिक सहायता तथा वर्ष में दो बार रेशम सीड भी उपलब्ध करवाए जाते हैं। विभागीय अधिकारी समय-समय पर निरीक्षण कर तकनीकी मार्गदर्शन भी देते हैं, जिससे उत्पादन प्रक्रिया आसान हो जाती है।

क्षेत्र की 40 से 50 महिलाएं जुड़ीं

मधु की सफलता से प्रेरित होकर क्षेत्र की अन्य महिलाएं भी इस व्यवसाय से जुड़ रही हैं। वर्तमान में सरकाघाट क्षेत्र की लगभग 40 से 50 महिलाएं रेशम कीट पालन कर रही हैं। इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि हुई है बल्कि महिला सशक्तिकरण को भी नई दिशा मिली है।

मधु का कहना है कि यह योजना ग्रामीण परिवारों को घर के निकट ही आय का स्थायी साधन उपलब्ध करा रही है और महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रही है।

सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाएं

रेशम कीट पालन योजना के अंतर्गत सरकार लाभार्थियों को कई प्रकार की सहायता उपलब्ध कराती है—

  • शहतूत के पौधों की रोपाई का पूरा खर्च सरकार वहन करती है।
  • रेयरिंग स्टैंड, ट्रे, प्लास्टिक नेट्स और अन्य उपकरण उपलब्ध करवाए जाते हैं।
  • बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए 20×20 फीट का रेशम कक्ष उपलब्ध कराया जाता है।
  • केंद्र एवं राज्य सरकार की सहायता से लाभार्थी को केवल 10 प्रतिशत व्यय वहन करना पड़ता है।
  • रेशम उत्पादन प्रक्रिया में ककून तैयार होने में मात्र 15 से 18 दिन लगते हैं।
  • एक सीजन में 15 से 18 हजार रुपये तक आय अर्जित की जा सकती है।

इस वर्ष बनेंगे 55 नए रेशम कक्ष

राजकीय रेशम केंद्र मौंही के रेशम निरीक्षक अरुण कुमार ने बताया कि उनके कार्यक्षेत्र में सज्याओ-पीपलू, बलद्वाड़ा और समैला क्षेत्र शामिल हैं, जो सेरीकल्चर डिवीजन संधोल के अंतर्गत आते हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष क्षेत्र में लगभग 250 लोगों को रेशम सीड आवंटित किए गए हैं तथा 50 से 55 नए रेशम कक्ष बनाए जा रहे हैं। इससे इतने ही परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। अरुण कुमार के अनुसार मार्च और अगस्त में आने वाले दो सीजन के माध्यम से एक उत्पादक सालाना 35 से 50 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर सकता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही मजबूती

रेशम कीट पालन कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने के साथ-साथ महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कम लागत, सरकारी सहायता और बेहतर बाजार मूल्य के कारण यह योजना ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करने का प्रभावी माध्यम बनती जा रही है।