भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा सांसद सुरेश कश्यप ने लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान हिमालयी और पहाड़ी राज्यों के लिए अलग पर्यावरण नीति बनाने की आवश्यकता का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश सहित अन्य पहाड़ी राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियां और पारिस्थितिक संवेदनशीलता मैदानी राज्यों से अलग है, इसलिए इनके लिए अलग और व्यावहारिक पर्यावरण नीति बनाई जानी चाहिए। लोकसभा में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से सवाल पूछते हुए उन्होंने यह जानना चाहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में तेजी से बढ़ते पर्यटन, औद्योगिक गतिविधियों, आधारभूत ढांचे के विस्तार और अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौतियों को देखते हुए केंद्र सरकार द्वारा क्या विशेष कदम उठाए जा रहे हैं।
हिमालयी क्षेत्र का महत्व
सांसद सुरेश कश्यप के प्रश्न का उत्तर देते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने बताया कि Indian Himalayan Region देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र न केवल पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए जीवन समर्थन प्रणाली प्रदान करता है, बल्कि देश के मैदानी क्षेत्रों में रहने वाली बड़ी आबादी के लिए भी जल, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। मंत्री ने कहा कि हिमालय से निकलने वाली नदियां और यहां के पारिस्थितिक तंत्र देश के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन की आधारशिला हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर नीति निर्माण
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत G.B. Pant National Institute of Himalayan Environment द्वारा भारतीय हिमालयी क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में पर्यावरणीय स्थितियों का निरंतर अध्ययन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि यह संस्थान वायु गुणवत्ता, जल गुणवत्ता, ध्वनि स्तर और पारिस्थितिक तंत्र पर मानव गतिविधियों के प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन करता है। इन अध्ययनों के आधार पर नीतिगत स्तर पर आवश्यक सुधार किए जाते हैं।
पर्यावरण संरक्षण के लिए नियामक प्रावधान
मंत्री ने बताया कि पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए कई नीतिगत और नियामक उपाय लागू किए गए हैं। इनमें प्रमुख रूप से Environmental Impact Assessment प्रक्रिया, वन संरक्षण से जुड़े नियम, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत अनुमति प्रक्रिया और संवेदनशील क्षेत्रों में विकास गतिविधियों के लिए निर्धारित मानक शामिल हैं। इन प्रावधानों के तहत किसी भी विकास परियोजना को तभी अनुमति दी जाती है जब वह पर्यावरणीय मानकों और वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर उपयुक्त पाई जाती है।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए दिशा-निर्देश
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन, धूल नियंत्रण, अपशिष्ट निपटान और प्रदूषण नियंत्रण के लिए Central Pollution Control Board द्वारा विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। इसके अलावा National Clean Air Programme के अंतर्गत देश के 130 शहरों में वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए व्यापक कार्य योजनाएं लागू की जा रही हैं, जिनमें भारतीय हिमालयी क्षेत्र के शहर भी शामिल हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य विभिन्न हितधारकों की भागीदारी से प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण को मजबूत करना है।
सतत पर्यटन पर जोर
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा पहाड़ी क्षेत्रों में सतत और जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतियां तैयार की गई हैं। इन रणनीतियों के तहत ढलानों के संरक्षण, जल स्रोतों की सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण, मृदा अपरदन रोकने, अपशिष्ट प्रबंधन और पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
संतुलित विकास की आवश्यकता
सांसद सुरेश कश्यप ने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां, प्राकृतिक संसाधनों की सीमाएं और पारिस्थितिक संवेदनशीलता मैदानी क्षेत्रों से अलग होती हैं, इसलिए इन राज्यों के लिए विशेष नीति और अलग दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार हिमालयी क्षेत्रों के सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। सांसद ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में पहाड़ी राज्यों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए और भी प्रभावी नीतियां लागू की जाएंगी, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ क्षेत्र के लोगों के विकास और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।