सुजानपुर टीहरा की होली: हमीरपुर की सांस्कृतिक पहचान

rakesh nandan

23/02/2026

सुजानपुर टीहरा की होली: इतिहास, परंपरा और समरसता का उत्सव

Sujanpur Tira की होली हमीरपुर जनपद की सांस्कृतिक आत्मा का सबसे उज्ज्वल उत्सव है। यह केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि इतिहास, लोकसंवेदना और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक है। जब बसंत की मादक बयार हिमालय की तराइयों को छूती हुई इस ऐतिहासिक नगर में प्रवेश करती है, तब सुजानपुर टीहरा रंग, रस और राग से परिपूर्ण एक विराट उत्सवभूमि में बदल जाता है। कटोच वंश की विरासत से समृद्ध यह नगर होली के अवसर पर राजसी गरिमा और जनसामान्य की आत्मीयता को एक सूत्र में पिरो देता है।


राजदरबार से जनउत्सव तक

Katoch Dynasty के संरक्षण में विकसित सुजानपुर टीहरा की होली का प्रारंभ राजदरबारों से हुआ था। समय के साथ यह उत्सव लोकजीवन में रच-बस गया और आज जन-जन का पर्व बन चुका है। इस होली में आज भी वह ऐतिहासिक गरिमा झलकती है जहाँ संस्कृति केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति हुआ करती थी। यह उत्सव अतीत और वर्तमान के बीच एक सजीव सेतु का कार्य करता है।


ढोल-नगाड़ों की थाप पर थिरकता नगर

होली के दिनों में सुजानपुर टीहरा का प्रत्येक चौक और प्रत्येक प्रांगण रंगमंच बन जाता है। ढोल-नगाड़ों की थाप, बांसुरी की मधुर तान और लोकगीतों की स्वर-लहरियाँ वातावरण को रसमय बना देती हैं।

पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकार जब मंच पर उतरते हैं, तो मानो लोकसंस्कृति स्वयं साकार हो उठती है। यहाँ के रंग केवल चेहरे पर नहीं, सीधे मन और आत्मा पर चढ़ते हैं।

हास्य, विनोद और श्रृंगार रस से ओत-प्रोत प्रस्तुतियाँ दर्शकों को भाव-विभोर कर देती हैं। लोकनृत्य और सामूहिक गायन इस उत्सव को विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं।


सामाजिक समरसता का संदेश

सुजानपुर टीहरा की होली सामाजिक एकता और भाईचारे का जीवंत उदाहरण है। इस दिन अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष, वृद्ध-युवा—सभी एक ही रंग में रंगे दिखाई देते हैं। यह पर्व स्मरण कराता है कि समाज की वास्तविक शक्ति उसकी सामूहिकता और सहृदयता में निहित है। भेदभाव की दीवारें स्वतः ढह जाती हैं और मानवता का रंग सबसे प्रबल हो उठता है।


पीढ़ियों को जोड़ती सांस्कृतिक चेतना

यह होली केवल उल्लास का अवसर नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद की प्रक्रिया भी है। वरिष्ठ जन अपने अनुभवों और परंपराओं के माध्यम से युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। लोकगीतों की पंक्तियों में इतिहास बोलता है और नृत्य की थाप पर भविष्य कदमताल करता है। यह परंपरा अतीत की स्मृति भर नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की सांस्कृतिक पूंजी है।


पर्यटन और आर्थिक सशक्तिकरण

आज सुजानपुर टीहरा की होली क्षेत्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर व्यापक पहचान बना चुकी है। दूर-दराज़ से आने वाले पर्यटक इस सांस्कृतिक उत्सव की ऊष्मा और जीवंतता को अनुभव करने पहुँचते हैं। यह पर्व न केवल सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि स्थानीय व्यापार, हस्तशिल्प और पर्यटन गतिविधियों को भी नई ऊर्जा प्रदान करता है।