गड़ागुसैंन कॉलेज में बी.कॉम. स्ट्रीम बंद करने के फैसले का SFI ने किया विरोध
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) हिमाचल प्रदेश राज्य कमेटी ने राजकीय महाविद्यालय गड़ागुसैंन में बी.कॉम. स्ट्रीम को बंद किए जाने के फैसले का कड़ा विरोध किया है। संगठन ने आरोप लगाया है कि प्रदेश सरकार उच्च शिक्षा संस्थानों को मजबूत करने के बजाय पाठ्यक्रम समाप्त करने की नीति अपना रही है, जिससे ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों के विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। एसएफआई ने जारी बयान में कहा कि सरकार बी.कॉम. स्ट्रीम को बंद करने के निर्णय को कम नामांकन के आधार पर उचित ठहराने का प्रयास कर रही है, जबकि वास्तविक समस्या कॉलेज में वर्षों से बनी आधारभूत सुविधाओं और शिक्षकों की कमी है।
ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है कॉलेज
संगठन के अनुसार राजकीय महाविद्यालय गड़ागुसैंन प्रदेश के एक दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्र में स्थित है। यहां अध्ययन करने वाले अधिकांश छात्र-छात्राएं आर्थिक और भौगोलिक कारणों से बड़े शहरों या अन्य जिलों में जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में यह कॉलेज क्षेत्र के युवाओं के लिए उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र है। एसएफआई का कहना है कि सरकार को इस संस्थान को मजबूत बनाने की दिशा में काम करना चाहिए था, लेकिन इसके विपरीत पाठ्यक्रमों को समाप्त किया जा रहा है।
अधूरा भवन और सुविधाओं की कमी
एसएफआई ने आरोप लगाया कि वर्ष 2018 के बाद से कॉलेज भवन का निर्माण कार्य आज तक पूरा नहीं हो पाया है। पर्याप्त कक्षाओं, पुस्तकालय, प्रयोगशालाओं और अन्य शैक्षणिक सुविधाओं की कमी के कारण विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। संगठन का कहना है कि आधारभूत सुविधाओं की कमी ने कॉलेज के शैक्षणिक वातावरण को प्रभावित किया है, जिससे विद्यार्थियों की संख्या पर भी असर पड़ा है।
शिक्षकों के रिक्त पदों का मुद्दा
एसएफआई ने कहा कि लंबे समय से कॉलेज में शिक्षकों के कई पद रिक्त पड़े हुए हैं। पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति नहीं होने के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हुई है और कई छात्रों को अपनी शिक्षा बीच में छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। संगठन के अनुसार यदि समय रहते रिक्त पदों को भरा जाता और शैक्षणिक सुविधाओं को बेहतर बनाया जाता, तो नामांकन में कमी जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
सरकार की नीति पर सवाल
एसएफआई ने आरोप लगाया कि नामांकन में कमी का कारण विद्यार्थियों की रुचि में कमी नहीं, बल्कि सरकारी संस्थानों की लगातार उपेक्षा है। संगठन का कहना है कि पहले सुविधाओं का अभाव रहने दिया जाता है, शिक्षकों की नियुक्तियां नहीं की जातीं और निर्माण कार्य अधूरे छोड़ दिए जाते हैं। बाद में कम नामांकन का हवाला देकर पाठ्यक्रम बंद कर दिए जाते हैं। एसएफआई ने इसे सरकारी शिक्षा संस्थानों को कमजोर करने वाली नीति बताया है।
SFI की प्रमुख मांगें
एसएफआई हिमाचल प्रदेश राज्य कमेटी ने सरकार के समक्ष कई मांगें रखी हैं। संगठन ने मांग की है कि:
- राजकीय महाविद्यालय गड़ागुसैंन में बी.कॉम. स्ट्रीम को तत्काल बहाल किया जाए।
- वर्ष 2018 से लंबित भवन निर्माण कार्य को जल्द पूरा किया जाए।
- शिक्षकों एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों के सभी रिक्त पदों को भरा जाए।
- विद्यार्थियों के लिए आवश्यक शैक्षणिक एवं आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएं।
- ग्रामीण एवं दुर्गम क्षेत्रों के उच्च शिक्षा संस्थानों को बंद करने के बजाय उन्हें सशक्त बनाया जाए।
आंदोलन की चेतावनी
एसएफआई ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इस निर्णय को वापस नहीं लिया तो संगठन प्रदेशभर के विद्यार्थियों को संगठित कर व्यापक आंदोलन शुरू करेगा। संगठन का कहना है कि उच्च शिक्षा के अधिकार और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े इस मुद्दे पर वह लगातार आवाज उठाता रहेगा। एसएफआई ने सरकार और शिक्षा विभाग से इस फैसले पर पुनर्विचार करने तथा विद्यार्थियों के हितों को प्राथमिकता देने की मांग की है।
शिक्षा संस्थानों को मजबूत बनाने की जरूरत
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित कॉलेज स्थानीय विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे संस्थानों में आधारभूत ढांचे, शिक्षकों और पाठ्यक्रमों को मजबूत करना आवश्यक है, ताकि युवाओं को अपने क्षेत्र में ही बेहतर शैक्षणिक अवसर मिल सकें। गड़ागुसैंन कॉलेज का मामला भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है, जिसमें शिक्षा की पहुंच, गुणवत्ता और सरकारी संस्थानों की मजबूती जैसे मुद्दे प्रमुख रूप से सामने आ रहे हैं।