बदलते दौर में परंपरा को थामे हुए एक कारीगर
Ghumarwin तहसील के गांव जसवाणी निवासी 73 वर्षीय रिखी राम आज भी अपने हाथों की मेहनत और पारंपरिक हुनर के बल पर जीवन यापन कर रहे हैं। लेकिन समय के साथ उनके चेहरे पर एक चिंता साफ झलकती है—पीढ़ियों से चली आ रही बांस और लकड़ी की शिल्प परंपरा अब समाप्ति की कगार पर है। रिखी राम बताते हैं कि उन्होंने शुरुआती लगभग 15 वर्ष पढ़ाई में लगाए, लेकिन आठवीं कक्षा में अंग्रेजी विषय में असफल होने के बाद स्कूल छोड़ दिया। इसके बाद पास के गांव भदरोग में 10-12 वर्षों तक लकड़ी की कारीगरी सीखी और काष्ठकला में महारत हासिल की। उन्होंने हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों, विशेषकर Shimla और Sirmaur में जाकर लकड़ी के मकान, दरवाजे-खिड़कियां और पारंपरिक निर्माण कार्य किए। पहाड़ी क्षेत्रों में उनकी कारीगरी की अच्छी मांग रहती थी।
हादसे ने बदली जिंदगी की दिशा
करीब 10 वर्ष पहले जसवाणी में काम करते समय उनके हाथ में गंभीर चोट आई और हड्डियां टूट गईं। इसके बाद भारी लकड़ी का काम छोड़ना पड़ा। जीवन यापन की चुनौती सामने थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने बांस से टोकरी, खारे और छडोलू जैसे पारंपरिक बर्तन बनाने शुरू किए। यह काम अपेक्षाकृत हल्का था और गांव में इसकी मांग भी थी।
बाजारवाद से घटती मांग
कुछ वर्षों तक काम ठीक चला, लेकिन बाजार में प्लास्टिक उत्पादों की बढ़ती उपलब्धता ने पारंपरिक बांस शिल्प को पीछे धकेल दिया। रिखी राम बताते हैं कि कभी हर घर में बांस की टोकरी और खारे का उपयोग होता था, लेकिन आज यह केवल विशेष अवसरों तक सीमित रह गया है। कच्चा माल यानी बांस भी अब आसानी से उपलब्ध नहीं होता। उन्हें गांव-गांव जाकर बांस ढूंढना पड़ता है।
नई पीढ़ी का रुझान कम
उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि युवा पीढ़ी इस पेशे से दूर जा रही है। मेहनत ज्यादा और आमदनी कम होने के कारण युवा इसे अपनाना नहीं चाहते। हालांकि उन्होंने अपने बेटे को यह हुनर सिखाया है, लेकिन वह मानते हैं कि केवल पारिवारिक प्रयास से यह कला लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकती।
सरकारी सहायता की उम्मीद
पारंपरिक कारीगरों के लिए केंद्र सरकार की PM Vishwakarma Yojana के तहत टूल किट खरीदने के लिए 15 हजार रुपये का अनुदान, सस्ती दरों पर ऋण और पांच दिन का उन्नत प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है। योजना की अधिक जानकारी के लिए जिला उद्योग केंद्र या बीडीओ कार्यालय में स्थित उद्योग प्रसार अधिकारी से संपर्क किया जा सकता है।
रिखी राम की कहानी केवल एक व्यक्ति की संघर्ष गाथा नहीं, बल्कि उन सैकड़ों कारीगरों की आवाज है जिनकी कला आधुनिकता और बाजारवाद के बीच संघर्ष कर रही है। यदि समाज और सरकार ने मिलकर ऐसे शिल्पकारों को प्रोत्साहन और बाजार उपलब्ध नहीं कराया, तो बांस और लकड़ी की यह विरासत इतिहास का हिस्सा बनकर रह जाएगी।