हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में आयोजित राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेले के अवसर पर स्थापित की गई “कहलूर दर्शन” प्रदर्शनी इन दिनों लोगों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। इस प्रदर्शनी के माध्यम से न केवल जिले की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिल रही है, बल्कि लोग बिलासपुर के इतिहास और परंपराओं के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर रहे हैं।
“कहलूर दर्शन” प्रदर्शनी में बिलासपुर तथा प्राचीन कहलूर रियासतकाल की लोक संस्कृति को बेहद आकर्षक और जीवंत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। यहां बांस से बनी पारंपरिक टोकरियां, मिट्टी के बर्तन और कच्चे घरों को सजाने के लिए की जाने वाली पारंपरिक चित्रकला को विशेष रूप से दर्शाया गया है। इन कलाकृतियों के माध्यम से ग्रामीण जीवनशैली और पुरानी परंपराओं को जीवंत रूप में दिखाया गया है, जो दर्शकों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रही हैं।
प्रदर्शनी में ग्रामीण परिवेश में त्योहारों के दौरान घरों की दीवारों पर की जाने वाली लोक चित्रकला और सजावट को भी सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह दृश्य दर्शकों को पुराने समय की याद दिलाते हैं और विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए यह एक नया अनुभव बन रहा है।
इसके अलावा, प्रदर्शनी में बिलासपुर के पारंपरिक विवाह समारोहों के रीति-रिवाजों को भी चित्रों और मॉडलों के माध्यम से दर्शाया गया है। इन प्रस्तुतियों के जरिए नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने का प्रयास किया गया है। यहां आने वाले लोग न केवल इन परंपराओं को देख रहे हैं, बल्कि उनके महत्व को भी समझने का प्रयास कर रहे हैं।
इतिहास प्रेमियों के लिए भी यह प्रदर्शनी बेहद खास है। इसमें बिलासपुर के ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को प्रमुखता से दिखाया गया है। विशेष रूप से बाबा नाहर सिंह मंदिर सहित कई प्राचीन मंदिरों की झलक प्रस्तुत की गई है। इसके साथ ही उन ऐतिहासिक धरोहरों को भी प्रदर्शित किया गया है, जो गोविंद सागर झील के निर्माण के बाद जलमग्न हो गई थीं। यह पहल दर्शकों को जिले के इतिहास के उस महत्वपूर्ण पहलू से अवगत कराती है, जिसे आज की पीढ़ी प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख पाती।
प्रदर्शनी का एक और प्रमुख आकर्षण ऋषि व्यास की प्रतिमा है, जिनके नाम पर बिलासपुर का नामकरण हुआ है। यह प्रतिमा क्षेत्र की पौराणिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को दर्शाती है और लोगों में खास रुचि का विषय बनी हुई है। प्रदर्शनी में आने वाले आगंतुक इस प्रतिमा के साथ तस्वीरें लेकर इस अनुभव को यादगार बना रहे हैं।
उपायुक्त राहुल कुमार ने बताया कि “कहलूर दर्शन” प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य मेले में आने वाले लोगों को बिलासपुर के गौरवशाली इतिहास, समृद्ध संस्कृति, बोली, परंपराओं और सांस्कृतिक गतिविधियों से रूबरू करवाना है। उन्होंने कहा कि इस पहल के माध्यम से यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों को पहचाने और इस विरासत को आगे भी संजोकर रखे।
नलवाड़ी मेला, जो पहले ही अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए प्रसिद्ध है, इस तरह की प्रदर्शनी से और अधिक समृद्ध हो रहा है। “कहलूर दर्शन” प्रदर्शनी न केवल लोगों को आकर्षित कर रही है, बल्कि यह सांस्कृतिक संरक्षण और जागरूकता का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभर रही है।
अंत में कहा जा सकता है कि यह प्रदर्शनी बिलासपुर की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक सराहनीय पहल है। आने वाले समय में इस तरह की पहलें प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करेंगी।
