हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में आयोजित राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेले में इस बार एक अनोखी कलाकृति लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यह कलाकृति जलमग्न हो चुके ऐतिहासिक भंजवाणी औहर पुल की है, जिसे प्रसिद्ध स्थानीय मूर्तिकार प्रेम सिंह ने तैयार किया है। इस कलाकृति के माध्यम से न केवल एक ऐतिहासिक धरोहर को जीवंत किया गया है, बल्कि लोगों को अपने अतीत से जोड़ने का प्रयास भी किया गया है।
यह कलाकृति प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत तैयार की गई है, जिसका उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को प्रोत्साहन देना है। प्रेम सिंह, जो बिलासपुर जिले के ग्राम कसेह (पंचायत हीरापुर) के निवासी हैं, अपनी उत्कृष्ट कला के लिए क्षेत्र में पहले से ही प्रसिद्ध हैं। उनकी यह नई रचना उनके हुनर और इतिहास के प्रति लगाव को दर्शाती है।
मूर्तिकार प्रेम सिंह ने बताया कि इस ऐतिहासिक पुल की कलाकृति को तैयार करने में उन्हें काफी समय और मेहनत लगी। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें अपने अतीत की कई यादें ताजा करने का अवसर मिला। उन्होंने इस कलाकृति के जरिए उन ऐतिहासिक संसाधनों और धरोहरों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है, जो विस्थापन के कारण समय के साथ लुप्त हो गए।
भंजवाणी औहर पुल का उस समय के जनजीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान था। यह पुल न केवल आवागमन का मुख्य साधन था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र था। प्रेम सिंह ने बताया कि उस समय इस पुल पर चौकीदार नाथूराम तैनात रहते थे, जो हरी झंडी दिखाकर लोगों के आवागमन को नियंत्रित करते थे। उनका विश्राम स्थल भी पुल के समीप ही स्थित था।
इतिहास के अनुसार, बिलासपुर राज्य की रानी अपने मायके जाने के लिए इसी पुल का उपयोग करती थीं, जबकि राजा औहर की ओर शिकार खेलने के लिए इसी मार्ग से जाया करते थे। उस समय बिलासपुर की बसें भी इसी पुल से गुजरती थीं। आम जनता के लिए यह पुल जीवन रेखा के समान था, जहां से लोग पैदल यात्रा करते थे और अपने पशुओं को भी इसी मार्ग से ले जाया करते थे।

हालांकि, समय के साथ हुए विकास कार्यों और गोविंद सागर झील के निर्माण के बाद यह ऐतिहासिक पुल जलमग्न हो गया। आज की पीढ़ी इस पुल को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख पाती, लेकिन इस तरह की कलाकृतियां उन्हें अपने इतिहास से जोड़ने का कार्य कर रही हैं।
नलवाड़ी मेले में इस कलाकृति को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। दर्शक न केवल इसकी बारीकी और सुंदरता की सराहना कर रहे हैं, बल्कि इसके पीछे छिपी ऐतिहासिक कहानी को भी जानने में रुचि दिखा रहे हैं। कई लोग इस कलाकृति के साथ तस्वीरें लेकर इस अनुभव को यादगार बना रहे हैं।
यह प्रदर्शनी न केवल ऐतिहासिक महत्व को उजागर करती है, बल्कि स्थानीय कला और संस्कृति के संरक्षण का भी एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती है। इस तरह की पहलें कलाकारों को मंच देने के साथ-साथ समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने में भी अहम भूमिका निभाती हैं।
अंत में कहा जा सकता है कि भंजवाणी औहर पुल की यह कलाकृति नलवाड़ी मेले की एक खास पहचान बन गई है। यह न केवल कला का उत्कृष्ट नमूना है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत और इतिहास को संजोकर रखने का एक प्रेरणादायक प्रयास भी है।
