मारकंड मंदिर में 13-15 अप्रैल तक बैसाखी मेला

rakesh nandan

10/04/2026

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित श्री महर्षि मार्कण्डेय मंदिर में इस वर्ष बैसाखी के पावन अवसर पर तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जा रहा है। यह पारंपरिक मेला 13 से 15 अप्रैल 2026 तक मंदिर परिसर में श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित होगा। इस संबंध में जानकारी देते हुए उप मंडलाधिकारी (नागरिक) सदर एवं मंदिर न्यास के अध्यक्ष डॉ. राजदीप सिंह ने बताया कि यह मेला क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


🔹 13 अप्रैल को होगा शुभारंभ

मेले का विधिवत शुभारंभ 13 अप्रैल को सायं 3 बजे किया जाएगा। इस अवसर पर पारंपरिक झंडा रस्म की शोभायात्रा निकाली जाएगी, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु और स्थानीय लोग भाग लेते हैं। यह शोभायात्रा मेले की शुरुआत का प्रमुख आकर्षण होती है और धार्मिक आस्था के साथ-साथ सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक मानी जाती है।


🔹 15 अप्रैल को होगा समापन

तीन दिवसीय इस मेले का समापन 15 अप्रैल को पारंपरिक छिंज/दंगल के आयोजन के बाद किया जाएगा। दंगल में क्षेत्र के पहलवानों के साथ-साथ बाहरी राज्यों के पहलवान भी भाग लेते हैं, जिससे यह आयोजन और भी रोमांचक बन जाता है।


🔹 धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

मारकंड मंदिर में आयोजित होने वाला बैसाखी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है। बैसाखी पर्व को फसल कटाई और नए साल के रूप में मनाया जाता है, और इस अवसर पर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना के साथ मेले का आयोजन किया जाता है।


🔹 श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण

मेले के दौरान श्रद्धालुओं को धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने का अवसर मिलेगा। इसके साथ ही:

  • पारंपरिक झंडा रस्म
  • छिंज/दंगल प्रतियोगिता
  • स्थानीय सांस्कृतिक गतिविधियां

जैसे आयोजन मेले को विशेष बनाते हैं।


🔹 लोगों से भाग लेने की अपील

डॉ. राजदीप सिंह ने सभी श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों से अपील की है कि वे मेले में बढ़-चढ़कर भाग लें। उन्होंने विशेष रूप से 13 अप्रैल को आयोजित झंडा रस्म और 15 अप्रैल को दंगल के समापन समारोह में उपस्थित रहने का आग्रह किया है।


🔹 सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का मंच

ऐसे मेले न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि समाज में एकता और भाईचारे को भी बढ़ावा देते हैं। स्थानीय लोग, व्यापारी और कलाकार इस अवसर पर एकत्रित होकर अपनी परंपराओं को जीवित रखते हैं।