पत्तल बनाकर आत्मनिर्भर बनीं मंडी की हेती देवी

rakesh nandan

11/04/2026

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की एक साधारण ग्रामीण महिला आज अपनी मेहनत और सरकार की योजनाओं के सहयोग से आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी है। बिहनधार गांव की रहने वाली हेती देवी ने पत्तल निर्माण के माध्यम से न केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की है, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनी हैं।

हेती देवी ज्योति स्वयं सहायता समूह की सचिव हैं और वर्ष 2018 से इस समूह से जुड़ी हुई हैं। उनका समूह टौर (एक विशेष पेड़) के हरे पत्तों से पत्तल (पत्तों की थाली) बनाने का कार्य करता है, जो मंडी और आसपास के क्षेत्रों में काफी लोकप्रिय है। इन पत्तलों का उपयोग विशेष रूप से विवाह-शादियों और अन्य सामूहिक आयोजनों में किया जाता है।


🌿 पर्यावरण के अनुकूल और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित

टौर के पत्तों से बनाई जाने वाली पत्तल पूरी तरह से प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल होती हैं। ये उपयोग के बाद आसानी से नष्ट हो जाती हैं, जिससे प्लास्टिक प्रदूषण कम करने में मदद मिलती है। इसके साथ ही यह स्वास्थ्य के लिहाज से भी सुरक्षित मानी जाती हैं, क्योंकि इनमें किसी प्रकार के रसायन का उपयोग नहीं होता।


💼 हाथ से मशीन तक का सफर

हेती देवी बताती हैं कि शुरुआत में वह पत्तल हाथ से बनाती थीं, जिससे उन्हें महीने में लगभग 5,000 रुपये की आय होती थी। लेकिन वर्ष 2023 के बाद उनके काम में बड़ा बदलाव आया, जब उन्हें विकास खंड मंडी के माध्यम से पत्तल बनाने की मशीन उपलब्ध करवाई गई। मशीन मिलने के बाद उनकी उत्पादन क्षमता और आय दोनों में वृद्धि हुई। अब वह हर महीने लगभग 10,000 रुपये तक कमा रही हैं। हालांकि उनकी आय ऑर्डर की मांग पर निर्भर करती है। इस सफलता में हिमाचल प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसने उन्हें संसाधन और मार्गदर्शन उपलब्ध करवाया।


💰 बेहतर गुणवत्ता, बेहतर कमाई

हेती देवी द्वारा बनाई गई पत्तलों की गुणवत्ता बाजार में उपलब्ध अन्य उत्पादों से बेहतर मानी जाती है।

  • हाथ से बनी पत्तल: 200 रुपये प्रति सैंकड़ा
  • मशीन से बनी पत्तल: 400 रुपये प्रति सैंकड़ा
  • हाथ से बने डूने: 100 रुपये प्रति सैंकड़ा
  • मशीन से बने डूने: 200 रुपये प्रति सैंकड़ा

बेहतर गुणवत्ता और बढ़ती मांग के कारण उनके उत्पादों की बिक्री लगातार बढ़ रही है।


📱 डिजिटल माध्यम से बढ़ी पहुंच

आज के डिजिटल युग में हेती देवी और उनका समूह मोबाइल फोन के माध्यम से ऑर्डर प्राप्त कर रहा है। इससे उनके काम को नई दिशा मिली है और बाजार तक पहुंच आसान हुई है। यह बदलाव ग्रामीण महिलाओं के लिए तकनीक के उपयोग का एक अच्छा उदाहरण भी है।


👩‍👩‍👧‍👦 समूह से मिली ताकत

समूह की प्रधान तृप्ता देवी बताती हैं कि उनका स्वयं सहायता समूह वर्ष 2018 में गठित हुआ था और इसमें छह महिलाएं शामिल हैं। सरकार की ओर से समूह को 40,000 रुपये का रिवॉल्विंग फंड प्रदान किया गया है, जिससे समूह के भीतर इंटर लोनिंग की जा रही है। इस कार्य से समूह की महिलाएं सालाना 1 से 1.5 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं, जिससे उनके परिवारों का भरण-पोषण बेहतर तरीके से हो रहा है।


🏛️ प्रशासन का सहयोग

जिला प्रशासन भी स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। उपायुक्त अपूर्व देवगन के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं प्रभावी रूप से लागू की जा रही हैं।


🌟 प्रेरणा बनी हेती देवी

हेती देवी की कहानी यह दर्शाती है कि यदि सही दिशा और अवसर मिले तो ग्रामीण महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकती हैं। सरकारी योजनाओं और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से वे न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुधार रही हैं, बल्कि समाज में भी अपनी एक अलग पहचान बना रही हैं।