प्रख्यात साहित्यकार और चिंतक कुलदीप शर्मा को साहित्य में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पंजाब कला साहित्य अकादमी द्वारा प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रीय पंकस अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाएगा। यह पुरस्कार उन्हें 7 दिसंबर, रविवार को जालंधर स्थित प्रेस क्लब हाल में आयोजित 29वें वार्षिक अकादमी अवार्ड समारोह में प्रदान किया जाएगा।
सशक्त रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए राष्ट्रीय पहचान
ऊना जिले के सुकडीयाल गांव में जन्मे कुलदीप शर्मा संवेदनशील और प्रभावशाली अभिव्यक्ति के लिए जाने जाते हैं। उनके कविता संग्रह ‘कवि का पता’, ‘आत्महत्या से बचे हुए लोग’ और उपन्यास ‘मलबा’ ने राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण पहचान बनाई है।
उन्होंने विभिन्न पत्रिकाओं के लिए सैकड़ों कविताएं, समीक्षाएं और लेख लिखकर साहित्य को समृद्ध किया है।
पूर्व सम्मान और उपलब्धियां
कुलदीप शर्मा को इससे पहले भी कई संस्थाओं द्वारा उत्कृष्ट लेखन के लिए सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें दुष्यंत स्मृति सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। वे राष्ट्रीय विपाशा कविता प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर चुके हैं, जिसके निर्णायक लीलाधर जगूड़ी, विजय कुमार और विजेंद्र जैसे वरिष्ठ साहित्यकार थे।
कविता, आलोचना और कथा—तीनों में सक्रिय उपस्थिति
उनकी पहली कविता 1976 में ‘हिमप्रस्थ’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद उनकी कविताएँ और समीक्षाएँ वसुधा, पहल, समकालीन साहित्य, दोआबा, आकंठ, विपाशा, जनपथ, वर्तमान साहित्य, अमर उजाला समेत अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। उनका नया कविता–संग्रह (गीत, ग़ज़लें, छंदबद्ध रचनाएँ) प्रकाशनाधीन है। एक अंग्रेज़ी उपन्यास की पांडुलिपि भी अंतिम चरण में है। उनकी कई कहानियाँ भी देशभर की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। पहली कहानी ‘लोकापवाद’ (1973) पंजाब केसरी में प्रकाशित हुई थी।
अकादमी सम्मान उनके रचनात्मक योगदान की पुष्टि
अकादमी द्वारा प्रदान किया जा रहा यह सम्मान उनके दीर्घकालिक सृजन, अध्ययनशीलता और साहित्यिक प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है। वे लेखन को अपनी मुख्य साधना मानते हैं और कहते हैं कि सतत सृजन ही किसी लेखक की वास्तविक पहचान होती है।
शिक्षा और साहित्यिक बोध का विस्तार
कुलदीप शर्मा की प्रारंभिक शिक्षा हटली के राजकीय विद्यालय में हुई। उन्होंने जालंधर के डीएवी कॉलेज से प्री-इंजीनियरिंग और हमीरपुर पॉलिटेक्निक से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।छात्र जीवन में उन्होंने रूसी, फ्रेंच और अमेरिकी साहित्य का गहन अध्ययन किया। डिकेन्ज़, तुर्गनेव, शोलोखोव, चेखव, दोस्तोवस्की, एमिल ज़ोला, पास्तरनाक, जॉर्ज ओरवेल और थॉमस हार्डी जैसे महान लेखकों ने उनके साहित्यिक दृष्टिकोण को समृद्ध किया। आइन रैंड की रचनाओं ने उनके वैचारिक क्षितिज को व्यापक बनाया। इसी दौर में वे कामू और सार्त्र के माध्यम से अस्तित्ववाद की ओर आकर्षित हुए और फिर भारतीय साहित्य में उसकी धारा का अध्ययन किया। गोदान, कब तक पुकारूँ और झूठा सच उनकी प्रिय कृतियों में शामिल हैं।