हिमाचल प्रदेश में उच्च शिक्षा से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा एक बार फिर सामने आया है। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (हपुटवा) ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की बैठक का कड़ा विरोध करते हुए इसे शिक्षकों के हितों की अनदेखी कर राजनीतिक निर्णयों का मंच करार दिया है।
संघ के अध्यक्ष डॉ. नितिन व्यास ने कहा कि प्रदेश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में कार्यरत हजारों शिक्षक पिछले सात वर्षों से अपने वैधानिक अधिकार—करियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS)—के तहत पदोन्नति की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
📚 CAS लागू न होने से शिक्षकों में रोष
डॉ. व्यास ने कहा कि CAS केवल पदोन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि शिक्षकों के शैक्षणिक विकास, शोध कार्य और संस्थागत गुणवत्ता को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण आधार है।
उन्होंने कहा कि इस योजना को लागू न करना न केवल शिक्षकों के मनोबल को गिरा रहा है, बल्कि प्रदेश की उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर भी नकारात्मक असर डाल रहा है।
उनके अनुसार, हिमाचल प्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य बनता जा रहा है, जहां शिक्षकों को उनके वैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। इससे शिक्षण पेशे में आने वाले युवाओं का रुझान भी प्रभावित हो रहा है।
💰 वेतन कटौती पर भी कड़ा विरोध
संघ के महासचिव डॉ. अंकुश भारद्वाज ने प्रदेश सरकार द्वारा ए और बी श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन से 3 प्रतिशत कटौती के निर्णय को कर्मचारी विरोधी बताया।
उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार शिक्षकों के लंबित वित्तीय लाभों को जारी नहीं कर रही, वहीं दूसरी ओर वेतन में कटौती कर कर्मचारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला जा रहा है।
महंगाई के दौर में यह निर्णय कर्मचारियों के लिए और अधिक कठिनाइयाँ पैदा करेगा।
⚖️ सरकार की नीतियों पर सवाल
हपुटवा ने आरोप लगाया कि सरकार अपने बढ़ते राजस्व घाटे को पूरा करने के लिए कर्मचारियों पर बोझ डाल रही है।
संघ के अनुसार, जहां एक ओर राजनीतिक वर्ग और उच्च प्रशासनिक अधिकारी विभिन्न सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, वहीं आम कर्मचारी और शिक्षक वर्ग की लगातार उपेक्षा की जा रही है।
इस स्थिति को संघ ने “दोहरी नीति” करार देते हुए इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया।
🏛️ कार्यकारी परिषद की भूमिका पर सवाल
संघ ने विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न उठाए हैं।
हपुटवा के अनुसार, यह परिषद, जो विश्वविद्यालय की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है, अब अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है और राजनीतिक प्रभाव में कार्य कर रही है।
संघ का कहना है कि परिषद द्वारा लिए जा रहे निर्णय न तो शिक्षकों के हित में हैं और न ही विश्वविद्यालय के विकास के लिए सहायक हैं।
📢 आंदोलन की चेतावनी
डॉ. नितिन व्यास ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि यदि शिक्षकों की लंबित मांगों को शीघ्र पूरा नहीं किया गया, तो संघ व्यापक आंदोलन शुरू करेगा।
उन्होंने कहा कि इस आंदोलन में प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शिक्षक भाग लेंगे।
📌 हपुटवा की प्रमुख मांगें
संघ ने सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने अपनी मांगें रखते हुए कहा—
- CAS के अंतर्गत लंबित पदोन्नतियों को तुरंत लागू किया जाए
- ए और बी श्रेणी के कर्मचारियों की 3% वेतन कटौती वापस ली जाए
- शिक्षकों के लंबित वित्तीय लाभ (DA व अन्य भत्ते) शीघ्र दिए जाएं
- विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त किया जाए
🔍 निष्कर्ष
हपुटवा का यह विरोध प्रदेश में उच्च शिक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों को उजागर करता है।
यदि इन मांगों पर समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो यह न केवल शिक्षकों में असंतोष को बढ़ाएगा, बल्कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और विश्वविद्यालयों की साख पर भी असर डाल सकता है।
अंत में संघ ने सभी शिक्षकों से एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया।