Himachal Pradesh में केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और राष्ट्रीय फेडरेशनों के संयुक्त मंच के आह्वान पर मजदूर संगठनों ने चार लेबर कोड के विरोध में प्रदेशव्यापी “काला दिवस” मनाया। इस दौरान CITU के बैनर तले राज्यभर में विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन आयोजित किए गए।
प्रदर्शनों का आयोजन कार्यस्थलों, ब्लॉक स्तर और जिला मुख्यालयों पर किया गया, जहां बड़ी संख्या में मजदूरों ने भाग लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की। इस दौरान देश के प्रधानमंत्री Narendra Modi को अधिकारियों के माध्यम से ज्ञापन सौंपे गए और चारों लेबर कोड को रद्द करने की मांग की गई।
राजधानी Shimla के डीसी कार्यालय में भी प्रदर्शन आयोजित किया गया, जिसमें सीटू के प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा, सचिव बालक राम, जिला सचिव रमाकांत मिश्रा सहित कई मजदूर नेता और कार्यकर्ता शामिल हुए।
प्रदर्शन को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि प्रस्तावित लेबर कोड लागू होने के बाद लगभग 70 प्रतिशत उद्योग और 74 प्रतिशत मजदूर श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हो जाएंगे। उनका कहना था कि इससे श्रमिकों के अधिकारों पर गंभीर असर पड़ेगा और उनकी सुरक्षा कमजोर होगी।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नए प्रावधानों के तहत हड़ताल करने पर मजदूरों को कड़ी सजा और जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उनका विरोध करने का अधिकार सीमित हो जाएगा।
मजदूर संगठनों का कहना है कि इन लेबर कोड के माध्यम से स्थायी रोजगार के बजाय ठेका प्रथा और फिक्स टर्म रोजगार को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे नौकरी की स्थिरता खत्म होगी और श्रमिकों की स्थिति अस्थिर हो जाएगी।
इसके अलावा, काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 घंटे तक करने की संभावनाओं को लेकर भी चिंता जताई गई। संगठनों ने इसे “बंधुआ मजदूरी” की दिशा में एक कदम बताया और कहा कि इससे श्रमिकों का शोषण बढ़ेगा।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि चारों श्रम संहिताएं दशकों के संघर्ष से प्राप्त श्रम कानूनों को कमजोर कर रही हैं। इससे मजदूरों की नौकरी की सुरक्षा, वेतन, सामाजिक सुरक्षा और ट्रेड यूनियन अधिकारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
मजदूर संगठनों ने अपनी मांगों में कहा कि इन चारों लेबर कोड को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए। साथ ही मौजूदा श्रम कानूनों को मजबूत किया जाए, न कि उन्हें कमजोर या समाप्त किया जाए।
उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम वेतन सुनिश्चित करने, ठेका प्रथा पर नियंत्रण लगाने और स्थायी रोजगार को बढ़ावा देने की भी मांग की। इसके अलावा सभी श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा जैसे ईपीएफ, ईएसआई, पेंशन और ग्रेच्युटी की सुविधा सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
संगठनों ने ट्रेड यूनियन अधिकारों की रक्षा और श्रमिकों के संगठन बनाने व आंदोलन करने के संवैधानिक अधिकार को सुरक्षित रखने की भी मांग की। साथ ही निजीकरण और विनिवेश की नीतियों पर पुनर्विचार करने की अपील की गई।
कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश में आयोजित यह काला दिवस प्रदर्शन श्रमिक वर्ग की बढ़ती चिंता और असंतोष को दर्शाता है। आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन सकता है।
