हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित मैड़ी गाँव की देवदार-आच्छादित पहाड़ियों के बीच बाबा बडभाग सिंह जी का डेरा आस्था, साधना और आध्यात्मिक उपचार का एक प्राचीन एवं प्रसिद्ध केंद्र है। यह स्थल हर वर्ष उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
🟦 इतिहास और साधना की पृष्ठभूमि
मान्यताओं के अनुसार बाबा बडभाग सिंह जी का जन्म वर्ष 1715 ईस्वी में पंजाब के करतारपुर में सोढ़ी वंश में हुआ। उन्हें धीर मल का वंशज तथा गुरु गोबिंद सिंह जी के परिवार से संबंधित बताया जाता है। अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों के दौरान उत्पन्न अस्थिर परिस्थितियों से बचते हुए बाबा जी हिमाचल की ओर आए। धारशणी खड्ड के समीप वनों में साधना करते हुए उन्होंने अंततः मैड़ी को अपनी तपस्थली बनाया। लोककथाओं के अनुसार बाबा जी ने एक बेर के वृक्ष के नीचे कठोर तपस्या कर अलौकिक सिद्धियां प्राप्त कीं। यह बेर वृक्ष आज भी तपस्थली के रूप में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
🟦 लोक-मान्यताएं और सामाजिक मनोविज्ञान
स्थानीय परंपराओं में नरसिंह नामक उग्र आत्मा की कथा प्रचलित है, जिसे बाबा जी ने वश में कर मानव सेवा के लिए बाध्य किया। इस मान्यता को अंधविश्वास के बजाय सामाजिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से देखा जाए तो ऐसे स्थल पारंपरिक समाजों में मानसिक भय, तनाव और असुरक्षा से निपटने के सांस्कृतिक माध्यम रहे हैं। आज भी मानसिक, शारीरिक और आत्मिक कष्टों से पीड़ित लोग यहाँ शांति और उपचार की कामना से आते हैं।
🟦 चरण गंगा और गुरुद्वारा परिसर
डेरा परिसर का मुख्य केंद्र गुरुद्वारा और बाबा जी की समाधि है। इसके समीप स्थित चरण गंगा जलप्रपात को पवित्र और रोगनाशक माना जाता है। श्रद्धालु यहां स्नान कर अरदास करते हैं और आध्यात्मिक शांति की अनुभूति करते हैं।
🟦 होली/होला मोहल्ला मेला : आस्था का उत्सव
हर वर्ष फरवरी–मार्च में आयोजित होने वाला 10 दिवसीय होली/होला मोहल्ला मेला मैड़ी को भक्ति और उत्सव के रंगों से भर देता है। इस दौरान हजारों श्रद्धालु पवित्र स्नान करते हैं, अरदास करते हैं और निशान साहिब के आरोहण के साक्षी बनते हैं। यह मेला मैड़ी को क्षेत्रीय सीमा से बाहर ले जाकर राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की सहभागिता इसे सांस्कृतिक संवाद और सामाजिक समरसता का मंच बनाती है।
🟦 लोक-तीर्थों का सांस्कृतिक महत्व
भारत की धार्मिक परंपरा केवल शास्त्रीय ग्रंथों तक सीमित नहीं रही है। ऐसे लोक-आधारित तीर्थस्थल सदियों से समाज को मानसिक स्थिरता, नैतिक दिशा और सामूहिक पहचान प्रदान करते आए हैं। 18वीं शताब्दी के अशांत दौर में संत परंपरा ने सामाजिक ताने-बाने को संभालने का कार्य किया और बाबा बडभाग सिंह जी का जीवन इसी ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। मैड़ी का डेरा यह समझने का अवसर देता है कि भारत की जीवंत संस्कृति किस प्रकार स्थानीय आस्थाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करती है—जहाँ विश्वास, आशा और उपचार हिमालय की गोद में आज भी एक साथ प्रवाहित होते हैं।
राजन कुमार शर्मा
गांव व डाकघर डुगली,
उप-तहसील लंबलू
जिला हमीरपुर
हिमाचल प्रदेश
