किसान–मजदूर संगठनों ने संयुक्त प्रतिवेदन पेश किया

rakesh nandan

26/11/2025

केंद्रीय श्रमिक संगठनों और संयुक्त किसान मोर्चा ने कृषि और श्रम क्षेत्र से जुड़े व्यापक संकट को लेकर संयुक्त प्रतिवेदन जारी किया है। यह प्रतिवेदन 26 नवंबर को देशभर में प्रस्तावित किसान–मजदूर एकता अभियान के तहत साझा किया गया है।

26 नवंबर को व्यापक लामबंदी का आह्वान

प्रतिवेदन में कहा गया है कि 26 नवंबर का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि 2020 में इसी दिन मजदूर संगठनों ने चार श्रम संहिताओं के खिलाफ राष्ट्रव्यापी हड़ताल की थी और किसानों ने तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध अपने संसद मार्च की शुरुआत की थी।
संयुक्त मंच ने कहा कि इस वर्ष भी किसान, मजदूर और ग्रामीण गरीब अपनी समस्याओं के समाधान के लिए एक साथ आवाज उठाएंगे।

श्रम संहिताओं और CETA के प्रति कड़ा विरोध

प्रतिवेदन में 21 नवंबर 2025 को बिना परामर्श चार श्रम संहिताओं को अधिसूचित करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
संगठनों ने भारत–यूके CETA समझौते को खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर हमला बताया है।
उन्होंने कहा कि यह समझौता भारतीय कृषि और स्वास्थ्य क्षेत्र को विदेशी कॉर्पोरेट नियंत्रण के लिए खोल देता है।

किसानों के लिए MSP और खरीद की गारंटी की मांग

प्रतिवेदन में कहा गया है कि खेती की लागत 12–15% प्रतिवर्ष बढ़ने के बावजूद MSP में केवल 2–7% तक की बढ़ोतरी हो रही है।
धान का MSP सी2+50% फॉर्मूला लागू किए बिना तय किया गया है और खरीद की कोई गारंटी नहीं दी गई।
कई राज्यों में मंडियों में जगह की कमी के कारण धान खरीद रुकी हुई है, जिससे किसान गंभीर संकट झेल रहे हैं।

भूमि अधिग्रहण, निजीकरण और डिजिटल कृषि पर आपत्ति

संयुक्त प्रतिवेदन में भूमि और फसलों के डिजिटलीकरण, राष्ट्रीय सहकारिता नीति, ICAR–MNC समझौतों तथा जबरन भूमि अधिग्रहण पर रोक की मांग की गई है।
संगठनों ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र और रणनीतिक उत्पादन का निजीकरण देश की आत्मनिर्भरता पर गंभीर खतरा है।

खाद्य सुरक्षा और पोषण बजट में कटौती पर चिंता

प्रतिवेदन के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में सरकार ने खाद्य सब्सिडी और उर्वरक सब्सिडी में बड़ी कटौती की है।
इसके परिणामस्वरूप बच्चों और महिलाओं में कुपोषण, एनीमिया और खाद्य असुरक्षा बढ़ी है।

रोजगार, मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा पर जोर

प्रतिवेदन में श्रमिकों के लिए राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन ₹26,000, पेंशन ₹10,000, OPS की बहाली, मनरेगा में 200 दिन का काम और नगरीय क्षेत्रों तक मनरेगा के विस्तार की मांग की गई है।
इसके अलावा निजीकरण, ठेका प्रथा और आउटसोर्सिंग पर रोक लगाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।


संयुक्त किसान–मजदूर प्रतिवेदन की मुख्य मांगें

  1. सभी फसलों के लिए C2+50% फार्मूले पर MSP और कानूनी गारंटी

  2. चारों श्रम संहिताएँ रद्द हों; ठेका/आउटसोर्सिंग बंद हो

  3. राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन ₹26,000 और पेंशन ₹10,000 लागू हो

  4. किसानों और कृषि मजदूरों का पूर्ण कर्जमाफी

  5. सार्वजनिक उपक्रमों और सेवाओं का निजीकरण बंद

  6. OPS बहाल हो और सभी को पेंशन मिले

  7. डिजिटल कृषि मिशन और ICAR–MNC समझौते वापस

  8. जबरन भूमि अधिग्रहण पर रोक और 2013 कानून लागू

  9. मनरेगा में 200 दिन का काम और शहरी क्षेत्रों तक विस्तार

  10. फसलों और पशुओं का सार्वजनिक बीमा

  11. महंगाई रोकें, PDS मजबूत करें, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा–स्वास्थ्य

  12. विदेशी कंपनियों की टैरिफ शर्तें अस्वीकार

  13. भारत–यूके CETA रद्द किया जाए

  14. सभी व्यापार समझौते संसद में पेश हों

  15. साम्प्रदायिक विभाजन रोकने के लिए सख्त कानून

  16. महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित