चुनाव से पहले नेता बनते सेवक…..फिर आम आदमी बनता सेवक

राकेश नंदन || 16 || 2025 || पत्रकारिता के अपने 15 साल के अनुभव में मैंने यही देखा है कि सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो—कांग्रेस या भाजपा—आम आदमी की हालत नहीं बदलती। आज भी उसे नेताओं और अफसरों के आगे हाथ जोड़कर अपनी बुनियादी समस्याओं का समाधान करवाना पड़ता है। विकास योजनाओं और चुनावी वादों के बावजूद आम आदमी को बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी ज़रूरतों के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना है कि जनता, जो असली मालिक है, वही सबसे ज्यादा बेबस दिखती है। हर पाँच साल बाद जब चुनाव की बारी आती है, तो पूरा माहौल बदल जाता है। नेता गलियों और चौपालों में जाकर आम आदमी के सामने हाथ जोड़ते हैं। घर-घर दस्तक देकर कहते हैं –आपका आशीर्वाद चाहिए, आपकी समस्याएँ हमारी जिम्मेदारी हैं।”  उस समय जनता को सच में लगता है कि अब उसकी आवाज़ सुनी जाएगी और उसकी ज़िंदगी बदलेगी। लेकिन हकीकत ये है कि चुनाव जीतने के बाद आम आदमी की ज़रूरतें और समस्याएँ वहीँ की वहीँ रह जाती हैं।

क्यों पूरी नहीं होतीं आम आदमी की ज़रूरतें?

  1. वादे कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं – चुनावी घोषणा-पत्र अक्सर हकीकत में लागू ही नहीं होता।

  2. प्राथमिकता बदल जाती है – जीतने के बाद नेताओं की प्राथमिकता जनता नहीं, सत्ता और राजनीति हो जाती है।

  3. ब्यूरोक्रेसी की देरी – प्रशासनिक ढिलाई और भ्रष्टाचार की वजह से योजनाएँ ज़मीनी स्तर तक नहीं पहुँच पातीं।

  4. जनता की चुप्पी – आम आदमी अपनी समस्याओं को लेकर एक-दो बार कहता है, लेकिन जब सुनवाई नहीं होती तो चुप हो जाता है। यही नेताओं को और बेपरवाह बना देता है।

जीत के बाद बदलती तस्वीर

लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं और जीत का ताज नेताओं के सिर पर सजता है, तस्वीर अचानक बदल जाती है। वही नेता जो चुनाव से पहले हर किसी से हाथ जोड़कर खड़े होते थे, अब जनता को उनके सामने हाथ जोड़ना पड़ता है। आम आदमी अपनी समस्याएँ लेकर जाता है, मगर उसे सिर्फ़ आश्वासन और वादों का पुलिंदा ही मिलता है।

नेताओं के आगे क्यों झुकती है जनता?

विकास कार्यों के लिए निर्भरता

सड़क, पानी, बिजली, स्कूल और अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएँ पूरी तरह सरकार और उसके प्रतिनिधियों पर निर्भर होती हैं। जनता चाहे या न चाहे, उसे इन कामों के लिए नेताओं की चौखट पर जाना ही पड़ता है।

 सत्ता और जनता का फासला

चुनाव जीतने के बाद नेताओं और जनता के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो जाती है। मंच से बड़े-बड़े भाषण होते हैं, योजनाओं की घोषणाएँ होती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत वही रहती है। जनता को लगता है कि उसकी आवाज़ ऊपर तक नहीं पहुँचती।

राजनीति का अहंकार

ज्यादातर नेता चुनाव जीतते ही जनता से दूरी बना लेते हैं। उनके सामने काम करवाना आसान नहीं होता। उसनके साथ उनके सेक्योरिटी जवान कहदे हो जाते है जैसे उन्हे को अभी किडनेप कर लेगा जो चुनाव से पहले बिना सिक्योरिटी के बिना गुमते थे। ऐसे में आम आदमी को अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए झुकना ही पड़ता है।

लोकतंत्र की कमज़ोर समझ

हमारे समाज में आज भी बहुत लोग नेता को “सेवक” नहीं बल्कि “शासक” मानते हैं। यही मानसिकता नेताओं को ताक़त देती है। जब जनता खुद ही हाथ जोड़कर खड़ी हो जाए, तो नेता खुद को राजा समझने लगते हैं।

असली लोकतंत्र की तस्वीर

लोकतंत्र का असली अर्थ है कि नेता जनता का प्रतिनिधि और सेवक हैं, मालिक नहीं। आम आदमी को नेताओं के आगे हाथ जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। लेकिन यह तभी संभव है जब जनता सजग होकर अपने अधिकार माँगे और नेताओं को उनकी जिम्मेदारी लगातार याद दिलाए।

उम्मीद की किरण

हालाँकि तस्वीर पूरी तरह काली नहीं है। आज भी कुछ जनप्रतिनिधि ऐसे हैं जो जनता की समस्याओं को अपनी प्राथमिकता मानते हैं और सचमुच जनता के बीच रहते हैं। लोकतंत्र की असली ताक़त तभी दिखेगी जब नेता चुनाव से पहले ही नहीं, बल्कि हर समय जनता के बीच उसी विनम्रता के साथ खड़े होंगे।

निष्कर्ष

लोकतंत्र सिर्फ़ वोट डालने तक सीमित नहीं होना चाहिए। अगर नेता सिर्फ़ चुनावी मौसम में हाथ जोड़ेंगे और आम आदमी को जीत के बाद सिर झुकाकर खड़ा रहना पड़ेगा, तो यह लोकतंत्र नहीं बल्कि राजनीति का खेल रह जाएगा। समय आ गया है कि जनता ऐसे नेताओं को चुने जो सिर्फ़ चुनावी मंच पर नहीं, बल्कि हर वक्त जनता के सेवक बनकर सामने आएँ। आम आदमी चाहे तो इस प्रवृत्ति को रोक सकता है। नेताओं के आगे हाथ जोड़ने की मजबूरी जनता की चुप्पी और उदासीनता से पैदा होती है। अगर जनता सजग हो जाए तो यह पूरी तस्वीर बदल सकती है।

कैसे रोक सकता है आम आदमी?

  1. सजग मतदान (Conscious Voting)
    वोट देते समय जाति, धर्म या छोटी-छोटी लालचों के बजाय काम और ईमानदारी पर वोट करें। जो नेता वादे पूरे न करे, उसे दोबारा मौका न दें।

  2. जवाबदेही तय करें (Accountability)
    चुनाव जीतने के बाद नेताओं से लगातार सवाल पूछें –
    “वादा किया था, पूरा क्यों नहीं किया?”
    यही दबाव लोकतंत्र को मजबूत करेगा।

  3. लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल
    RTI (सूचना का अधिकार), सोशल मीडिया और जन आंदोलन के ज़रिए जनता नेता और प्रशासन से जवाब मांग सकती है।

  4. सामूहिक ताक़त दिखाएँ
    अकेला आदमी झुकता है, लेकिन जब पूरा समाज एक साथ खड़ा हो जाए तो नेताओं को भी झुकना पड़ता है।

  5. सेवक बनाम शासक की सोच बदलें
    जनता को याद रखना चाहिए कि नेता “सेवक” हैं, मालिक नहीं। अगर जनता यह मानसिकता अपनाएगी तो नेताओं को भी अपना रवैया बदलना होगा।

✅ नतीजा

आम आदमी अगर चुप न बैठे, अपने अधिकारों के लिए खड़ा हो और नेताओं से लगातार जवाब मांगे तो स्थिति बदल सकती है। फिर नेताओं को ही हर समय जनता के सामने हाथ जोड़कर खड़ा होना पड़ेगा, न कि जनता को।